स्वयं को ऊँचा उठायें - व्यक्तित्ववान बनें*
*स्वयं को ऊँचा उठायें - व्यक्तित्ववान बनें*
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(कुंभ के अवसर पर वानप्रस्थ सत्र में दिया गया प्रवचन)
गायत्री मंत्र हमारे साथ- साथ बोलिए-
ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्।
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*शंख ध्वनि से आमंत्रण*-03
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हरिद्वार में गंगा विस्तृत क्षेत्र में फैली हुई है, परंतु नहीं साहब, हम तो हर की पौड़ी में ही स्नान करेंगे। अरे बाबा, हरिद्वार की हर की पौड़ी भी तो किसी काम की नहीं है। यह तो हमारे लिए किसी ने खोदकर नहर निकाल दी है। यह तो एक नहर है। आप मालूम कर लीजिए हर की पौड़ी एक नहर है। यह क्या? हर की पौड़ी तो गंगाजी है। गंगाजी तो है, पर खोदकर लाई गई है। गंगाजी में आपको नहाना है, तो आप वहाँ जाइये- नीलधारा पर नहाइये। यह गंगाजी नहीं है। यह मनुष्यों की बनाई हुई नहर है। नहीं साहब, हम तो ब्रह्मकुण्ड में नहाएँगे, हम तो यहीं नहाएँगे। हम तो ये करेंगे और हम तो नंगे होकर नहाएँगे। इस तरह के लोगों के दर्शन करने को अब आदमी नहीं जाता है। मुझे बहुत खुशी है कि लोगों ने इस साल कुंभ में आने से इनकार कर दिया और मैं भगवान् से प्रार्थना करूँगा कि अगले वर्ष भी वे यहाँ न आयें। इसमें सफाई कर्मचारियों के अलावा, पुलिस वालों के अलावा और बाबाजियों के अलावा, तीसरा कोई जनता न आवे। तीन आदमी आ जाएँ। बस, काम बन जाएगा। लोग क्यों आने चाहिए? और क्यों पैसा खराब करना चाहिए? इनको किस काम के लिए पैसा खराब करना चाहिए? छह तारीख को आप नहाएँगे, तो बैकुंठ को जाएँगे। हर की पौड़ी के ब्रह्मकुंड में नहाकर के आप बैकुंठ को जाएँगे? यह बहम जिनके दिल के ऊपर सवार है, उनकी तादाद खत्म होनी चाहिए। जिनको यह बहम हो गया है कि छह तारीख को न नहाने से बैकुंठ नहीं जाएँगे और हर की पौड़ी के कुंड पर नहा लेंगे, तो सीधे बैकुंठ को जाएँगे और वहाँ सड़कों पर नहा लेंगे तो नरक को जाएँगे। इस तरह की मनोवृत्ति जितनी लोगों में कम होती चली जाएगी, धर्म की उतनी ही सेवा होती जाएगी।
बात तो पैसे के बारे में है। उससे अपने हाथ बिलकुल साफ रखना। जहाँ कहीं भी आपको पैसे चढ़ाने का मौका आए, आरती का मौका आए, पूजा का मौका आए, कोई भी पैसा आता हो, वहाँ आप लेना मत। आप चाहें कि इकट्ठा दस हजार जेब में भरते जाएँ और कहें कि अरे साहब! ये पूजा की आरती में पैसे आये थे। ऐसा मत करना आप। यद्यपि यह सब करने का मौका मिलेगा। आप वहीं के लोगों को बुलाना और देखना कोई पैसे आते हैं, चढ़ावे में आते हैं, सामने रखे जाते हैं। कोई चवन्नी चढ़ा जाती है लड़की, कोई अठन्नी चढ़ा जाती है। इस तरह पैसे का हिसाब बढ़ता चला जाएगा। इनको आप उसमें रखना, जमा करना। आप पैसे के बारे में हाथ साफ रखना। आपको शाखा जो कुछ भी दे वह किराये- भाड़े के रूप में कहीं भी जमा रखना। किराया आपको जो कुछ भी लेना हो, अपना खर्च वहीं से लेना। बाहर के लोगों से आप ये शिकायत न करना कि हमें साबुन की जरूरत है, कपड़े की जरूरत है और हमको वो वाली चीज चाहिए, हमको फलानी चीज चाहिए। कोई लाकर दे दे साबुन तो बात अलग है, लेकिन अगर आपको न दे तो आप अपने पैसे से ले लेना। नहीं तो वहाँ के आदमी से माँग लेना, लेकिन वहाँ के लोगों का कोई दान- दक्षिणा का पैसा आप मंजूर मत करना।
क्रमशः जारी
*पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य*
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